बालप्रहरी का प्रकाशन अखिल भारतीय जन विज्ञान नैटवर्क व भारत ज्ञान विज्ञान समिति उत्तराखंड के साथियों की पहल पर सन् 2004 में प्रारंभ हुआ। प्रांरभ में भारत ज्ञान विज्ञान समिति के माध्यम से बाल मेलों व बाल विज्ञान मेलों का आयोजन किया गया। बाद में बाल मेलों में कविताएं, कहानी विधा लेखन को भी बच्चों के लिए जोड़ा गया। कार्यशला अवधि में बच्चों द्वारा तैयार तैयार कविताएं कहानी व चित्रों को जोड़ते हुए हमने हस्तलिखित पत्रिकाएं तैयार करना प्रारंभ किया। ये हस्तलिखित पत्रिका हमारे पास रहती थी। बाद में सोचा गया क्यों न एक ऐसी पत्रिका निकाली जाए जिसमें बच्चों की रचनाएं भी छपे और ये पत्रिका बच्चों के पास रहे। इसी सोच के रहते हुए पहले-पहल बालप्रहरी हस्तलिखित तौर पर चार पृष्ठ की तैयार की गई। उन दिनों फोटोस्टेट के लिए एक पृष्ठ के लिए  50 पैसा देना होता था। चार पृष्ठ फोटो स्टेट करवाकर हम इसे दो रुपए में बेचते थे।  बाद में रजिस्ट्रार ऑफ न्यूज पेपर्स से ‘बालप्रहरी’ नाम हमें मिला। तब बालप्रहरी का प्रकाशन  त्रैमासिक किया जाने लगा। बालप्रहरी के प्रवेशांक का लोकार्पण 11 जुलाई,2004 को द्वाराहाट के तत्कालीन खंड शिक्षा अधिकारी श्री ओमप्रकाश हर्बोला की अध्यक्षता में संपन्न लोकार्पण समारोह में तत्कालीन संयुक्त निदेशक शिक्षा विभाग नैनीताल श्री दानसिंह रौतेला द्वारा किया गया। राजकीय इंटर कालेज द्वाराहाट के सभागार में आयोजित समारोह में प्रसिद्ध साहित्यकार श्री गंभीरसिंह पालनी सहित कई साहित्यकार व शिक्षाक्षाविद तथा शुभचिंतक उपस्थित रहे।


    बालप्रहरी के प्रवेशांक से ही बालप्रहरी में कम से कम 12 पृष्ठों पर बच्चों की रचनाएं दी जाती रही हैं। ये बच्चे कौन होंगे। इसके लिए बालप्रहरी द्वारा भारत ज्ञान विज्ञान समिति के साथ मिलकर स्थान.स्थान पर बच्चों की लेखन कार्यशालाओं का आयोजन जन सहयोग से किया जाता रहा है। इन कार्यशालाओं के माध्यम से बच्चों का जुड़ाव बालप्रहरी से हो रहा है। बालप्रहरी के हर अंक में लगभग 100 से अधिक बच्चों को अपनी अभिव्यक्ति का अवसर मिल रहा है। अपनी रचनाओं को बच्चे स्वयं तो पढ़ते ही हैं दूसरे लोगों को भी पढ़ाते हैं। इसके लिए हमें स्कूलों के शिक्षकों एवं अभिभावकों का सहयोग मिल रहा है।


    बालप्रहरी द्वारा उत्तराखंड के अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत, ऊधमसिंहनगर, उत्तरकाशी, चमोली, देहरादून, पौड़ी, रूद्रप्रयाग, टिहरी, हरिद्वार जनपदों के अतिरिक्त भागलपुर(;बिहार), भीलवाड़ा, उदयपुर, राजसमंद,सलूंबर (राजस्थान) मुरादाबाद, गोरखपुर, देवरिया (उ.प्र.) महासमुंद (छत्तीसगढ़) आदि स्थानों पर बच्चों की 5-.5 दिवसीय लेखन कार्यशलाओं का आयोजन जन सहयोग से यानी स्थानीय मित्रों के सहयोग से किया जाता रहा है। अणुव्रत विव भारती  द्वारा गोहाटी, कोलकाता तथा चेन्नई आदि स्थानों पर आयोजित बच्चों की लेखन कार्यशाला में संपादक बालप्रहरी द्वारा बतौर संदर्भ व्यक्ति सहभागिता की जाती रही है।
    बालप्रहरी पत्रिका की ओर से अल्मोड़ा, द्वाराहाट, बेरीनाग, गंगोलीहाट, पिथौरागढ़, नैनीताल, खटीमा, देहरादून, जोशीमठ, उत्तरकाशी तथा उत्तराखंड के अन्य स्थानों के अतिरिक्त उ.प्र. हिंदी संस्थान लखनऊ, गढ़वाल भवन दिल्ली, देवरिया, भागलपुर आदि स्थानों पर भी बालसाहित्य की संगोष्ठियां स्थानीय स्तर पर आयोजित की जाती रही हैं।


    बालप्रहरी तथा बालसाहित्य संस्थान द्वारा प्रतिवर्ष जून माह में उत्तराखंड में बालसाहित्य पर राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों का आयोजन जन सहयोग से किया जाता रहा है। अभी तक अल्मोड़ा, द्वाराहाट, कौसानी भीमताल, उत्तरकाशी, मसूरी, जोशीमठ, अंजनीसैण, गैरसैण,नैनीताल आदि स्थानों पर बालसाहित्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठियों का आयोजन किया जा चुका है। संगोष्ठी में प्रतिवर्ष लगभग 100 से अधिक साहित्यकार प्रतिभाग करते हैं।


    उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र से प्रकाशित होने वाली बाल पत्रिका बालप्रहरी ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। देश के प्रतिष्ठित रचनाकारों का आशीर्वाद जहां पत्रिका को मिल रहा है, वहीं देश के विभिन्न राज्यों के बच्चों की रचनाएं बालप्रहरी में प्रकाशित हो रही हैं। भारत सरकार के केंद्रीय हिंदी निदेशलय ने गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी को बढ़ावा देने की योजना के तहत बालप्रहरी की 625 प्रतियां गैर हिंदी भाषी राज्यों के स्कूलों एवं संस्थाओं के लिए क्रय करके बालप्रहरी को संबल प्रदान किया जा रहा है। उत्तराखंड के महानिदेशक शिक्षा विभाग ने बालप्रहरी को उत्तराखंड के स्कूलों के स्वीकृत किया है। वहीं हिंदी अकादमी दिल्ली सहित कई सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं के माध्यम से बालप्रहरी देश के विभिन्न ग्रामीण अंचलों के स्कूलों में पहुंच रही है। बाल कल्याण एवं बालसाहित्य शोध संस्थान भोपाल ने सन् 2010 में आयोजित अपने वार्षिक समारोह में बालप्रहरी को देश की सर्वश्रेष्ठ बाल पत्रिका का सम्मान देकर इसे मान्यता प्रदान की है।


    हस्तलिखित पत्रिका के सफर से चलते हुए बालप्रहरी ने अपने प्रकाशन के 18 वर्ष पूरे कर लिए हैं। मित्रों व बच्चों के अमूल्य सुझावों को जोड़ते हुएसमय-समय पर इसमें कई परिवर्तन भी किए हैं। हमारा मानना है कि इस पत्रिका को बालोपयोगी बनाने की अभी काफी गुंजाइश है। इसके लिए हमें मित्रों व शुभचिंतकों से बालोपयोगी एवं वैज्ञानिक सोच आधारित रचनाओं की अपेक्षा है।